Chhatrapati Shivaji Jayanti: छत्रपति शिवाजी महाराज की वीरता का इतिहास, जानें

गुलामी की जंजीरों को तोड़ने वाले, मुगलों और दक्कन के राजाओं की नाक में दम करने वाले, भारत में स्वराज की भावना को जन्म देने वाले और जरूरतमंदों का ख्याल रखने वाले वीर पुरुष हमेशा पैदा नहीं होते हैं. हम ऐसे ही वीर पुरुष Chhatrapati Shivaji Maharaj Jeevani के बारे में बताएंगे जो एक भारतीय शासक थे जिन्होंने मराठा साम्राज्य खड़ा किया और अपनी बहादुरी, बुद्धिमानी, शौर्य और दयालुता के कारण सबसे पसंदीदा राजा बने रहे. शिवाजी महाराज भारत माता के लिए अपना जीवन न्यौछावर करने वाले वीरों में एक थे. जिस समय लगभग पूरे उत्तर भारत पर मुगलों का राज था उस समय हिंदू धर्म खतरे में था और भारत के अधिकतर राजाओं ने मुगलों की अधीनता स्वीकार कर ली थी.

उस दौरान एक चिंगारी भारत के दक्षिण में जल रही थी जिसमें भारत में हिंदवी स्वराज के लिए लोगों के मन में उत्सुकता पैदा करने लगी थी. उस समय राजा का राज्य भले ही इतना बड़ा नहीं था लेकिन इस राजा ने जिस विचार को जन्म दिया, उस विचार ने भारत में मराठा साम्राज्य का शासन दक्षिण से लेकर अफगानिस्तान तक किया था.



शिवाजी महाराज का प्रारंभिक जीवन | Chhatrapati Shivaji Maharaj jeevani

19 फरवरी, 1630 को मराठा साम्राज्य के सबसे पहले छत्रपति महाराज का जन्म शिवनेरी दुर्ग पुणे में हुआ था. कुछ जगह उनके जन्मतिथि को 6 अप्रैल, 1627 दर्ज कराया गया है जबकि मराठा लूनर कैलेंडर के अनुसार कुछ पार्टीज इसे 4 मार्च को भी मानते हैं. शिवाजी महाराज के पिता शहा जी भोसले और माता जीजाबाई थीं, जिस समय शिवाजी का जन्म हुआ था तब भारत की गद्दी पर दिल्ली शाहजहां का शासन था और दक्कन में तीन प्रदेश अहमदनगर में निजामशाही, बीजापुर में आदिलशाही और गोलकुंडा में कुतुबशाही का शासन था. शिवाजी के पिता बीजापुर सल्तनत में सेना कमांडर थे इस वजह से शिवाजी का बचपन अपनी माता के साथ गुजरा था. शिवाजी की माता जीजाबाई ने उन्हें रामायण और महाभारत की कहानियां सुनाकर उन्हें योद्धा और कुशल रण नीतिकार बनाया था, इसे सुनकर ही वे हिंदुत्व के प्रति अपने आपको समर्पित करने के लिए तैयार हुए. शिवाजी के गुरु दादू जी कोंड देव थे लेकिन इनकी असली शिक्षा इनकी माता से मिली. शिवाजी बुद्धि के बहुत तेज थे उन्होंने बहुत अधिक शिक्षा तो नहीं ली लेकिन जितना भी सीखा उसे अपने अंदर उन्होंने बहुत जल्दी उतारा. 12 साल की उम्र में शिवाजी बंगलौर गए, जहां उन्होंने साईंबाई के साथ शादी कर ली थी.

शिवाजी महाराज की लड़ाइयां

Chhatrapati Shivaji Maharaj jeevani
Chhatrapati Shivaji Maharaj jeevani

15 साल की उम्र में शिवाजी ने पहला युद्ध लड़ा था, उन्होंने तोरना किले में हमला करके उसे जीत लिया, जिसके बाद उन्होंने कोंडाना और राजगढ़ किले में तीज हासिल की थी. शिवाजी के बढ़ती शक्ति को देखकर बीजापुर के सुल्तान ने शाहजी (शिवाजी के पिता) को कैद करवा लिया था, शिवाजी और उनके भाई शाहजी ने कोंडाना के किले को वापस किया, जिसके बाद उनके पिताजी को छोड़ दिया गया. अपनी रिहाई के बाद शाहजी अस्वस्थ रहने लगे और 1964-65 के आस-पास में उनकी मौत हो गई, जिसके बाद शिवादी ने पुरंदर और जवेली की हवेली में भी मराठा ध्वज लहरा दिया थाय़ बीजापुर के सुल्तान ने साल 1659 में शिवाजी के खिलाफ अफजल खान की एक विशाल सेना भेजी और धमकाया कि शिवाजी को जिंदा या मरा लेकर आए. अफजल खान ने शिवाजी को मारने की कोशिश कूटनीति से की, लेकिन शिवाजी ने अपनी बुद्धि से अफजल खान को मार दिया. शिवाजी की सेना ने बीजापुर के सुल्तान को प्रतापगढ़ से हराया. यहां शिवाजी की सेना को बहुत से शस्त्र, हथियार मिले जिससे मराठा सेना और ज्यादा ताकतवर बन गई. बीजापुर के सुल्तान ने एक बार फिर बड़ी सेना भेदकर शिवाजी पर आक्रमण किया. इस युद्ध का नेतृत्व रुस्तम जमान ने किया था लेकिन इस बार भी शिवाजी की सेना ने उन्हें कोल्हापुर में हरा दिया था.



शिवाजी और मुगलों की लड़ाई

शिवाजी जैसे-जैसे आगे बढ़ रहे थे उनके दुश्मनों की संख्या और भी ज्यादा बढ़ने लगी थी. शिवाजी के सबसे बड़े दुश्मन मुगल बन गए और साल 1657 में शिवाजी ने मुगलों के खिलाफ लड़ाई शुरु कर दी और उस समय मुगल साम्राज्य औरंगजेब के पास था, उसने शाइस्ता खान की सेना को शिवाजी के खिलाफ खड़ा कर दिया था, जिसने पुना में अधिकार जमाया था और सेना का विस्तार किया. एक रात शिवाजी ने अचानक पुना पर हमला करके हजारों मुगल सेना के लोगों को मार दिया लेकिन शाइस्ता वहां से भाग गया. इसके बाद साल 1664 में शिवाजी ने सूरत में भी मराठा ध्वज फहरा दिया था. इसके बाद भी औरंगजेब ने हार नहीं मानी और उसने अंबर के राजा जय सिंह और दिलीर सिंह को शिवाजी के खिलाफ कर दिया. जय सिंह ने हर लड़ाई तो हारी लेकिन शिवाजी से पुरंदरपुर में हरा दिया था. इस हार के बाद शिवाजी को मुगलों के साथ समझौता करना पड़ा और शिवाजी ने 23 किलों के बदले मुगलों का साथ दिया.

समझौते के बाद औरंगजेब ने शिवाजी के साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया, उसने शिवाजी और उनके बेटे को जेल में बंद कर दिया था. मगर शिवाजी अपने बेटे के साथ आगरा के किले से भाग निकले. अपने राज्य पहुंचने के बाद शिवाजी ने नयी ताकत के साथ मुगलों के खिलाफ झेड़ दी, इसके बाद औरंगजेब ने शिवाजी को राजा मान लिया था. साल 1674 में शिवाजी महाराष्ट्र के अकेले शासक बन गए थे और हिंदू रिवाजों के अनुसार शासन करने लगे.

शिवाजी का राज्याभिषेक

महाराष्ट्र में हिंदू राज्य की स्थापना शिवाजी ने साव 1674 में किया और इसके बाद उनका राज्याभिषेक हुआ. शिवाजी कुर्मी जाति के थे, जिन्हें उस सयम शुद्र ही माना जाता था. इस वजह से ब्राह्मणों ने उनका विरोध किया और राज्यभिषेक करने से मना कर दिया. शिवाजी ने बनारस के भी ब्राह्मणों को आमंत्रित किया था लेकिन वे भी नहीं माने तब शिवाजी ने उन्हें घूस देकर मना लिया और फिर राज्याभिषेक हुआ. यही पर उन्हें छत्रपति की उपाधि से सम्मानित किया गया और इसके 12 दिनों के बाद उनकी माता जीजाबाई का देहांत हो गया था, इसके बाद शिवाजी ने शोक मनाया और कुछ समय बाद राज्याभिषेक करवाया था. इसमें दूर-दूर से राजा पंडितों को बुलाया गया जिसमें काफी खर्चा हुआ और इसके बाद ही शिवाजी ने अपने नाम का सिक्का चलवाया था.

Chhatrapati Shivaji Maharaj jeevani
Chhatrapati Shivaji Maharaj jeevani

शिवाजी धार्मिक धारा वाले वीर पुरुष थे और वे सभी धर्मों का आदर करते थे. शिवाजी ने अपना राष्ट्रीय ध्वज नारंगी रखा जो हिंदुत्व का प्रतीक माना जाता है. इसके पीछे भी एक कथा है वो ये कि शिवाजी रामदास जी से बहुत लगाव रखते थे जिनसे शिवाजी ने बहुत कुछ सीखा था. एक बार रामदास जी राज्य में भीख मांग रहे थे और जब उन्हें शिवाजी ने देखा तो इससे वे बहुत दुखी हुए और उन्हें महल ले गए जहां पर उन्हें चरणों में गिरकर उनसे आग्रह करने लगे कि भीख ना मांगे बल्कि ये सारा साम्राज्य अपने नाम कर लें. स्वामी रामदास जी शिवाजी की भक्ति देखकर खुश हुए लेकिन वे सांसारिक जीवन से दूर रहना चाहते थे जिससे उन्होंने साम्राज्य लेने से मना कर दिया और शिवाजी को एक नारंगी रंग का कपड़ा फाड़कर दिया कि इसे अपना राष्ट्रीय ध्वज बना लें.



शिवाजी की मृत्यु | Death of Chhatrapati Shivaji Maharaj

शिवाजी महाराज वीर योद्धा थे और उन्होंने हर बार मौत को मात दी है. मगर बहुत कम उम्र में वे दुनिया से चले गए. राज्य की चिंता को लेकर उनके मन में बहुत असमंजस था जिसके कारण शिवाजी की तबियत खराब रहन लगी और लगातार 3 हफ्तों से उन्हें तेज बुखार आने लगा और 3 अप्रैल, 1680 को उनका देहांत हो गया. सिर्फ 50 साल की उम्र में उनकी मौत होने से पूरा साम्राज्य शोक में डूब गया और उनके बेटे Sambhaji Bhosale भी बहुत परेशान रहने लगे और उनके ऊपर पूरे साम्राज्य की जिम्मेदारी आ गई. शिवाजी के मरने से उनके वफादारों ने उनके साम्राज्य को संभाले रखा और मुगलों से लड़ाई जारी रखी. इस लड़ाई को उनके बड़े बेटे संभाजी महाराज ने लड़ी और अपनी आखिरी सांस तक उन्होने पूरी ईमानदारी से अपने साम्राज्य की रक्षा की लेकिन साल 1689 में उनका भी निधन हो गया था. इसके बाद भी मराठों ने हार नहीं मानी और हमेशा अपने ध्वज की रक्षा करते हुए देश के प्रति समर्पित हो गए.

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