क्या है फास्ट ट्रैक कोर्ट? कैसे होती है सुनवाई, जानिए यहां सबकुछ

16 दिसंबर, 2012 की रात देश में एक ऐसी घटना हुई जिसने देश को झकझोंर कर रख दिया। ये वारदात थी एक चलती बस में 5 लोगों ने एक लड़की के साथ सामुहिक बलात्कार किया था। इतना ही नहीं बलात्कार के बाद उस लड़की की निर्दयता के साथ हत्या कर दी गई थी। दोषियों को पकड़ लिया गया और उनके लिए फार्स्ट ट्रैक कोर्ट में सुनवाई हुई। फास्ट ट्रैक कोर्ट तब ही ज्यादा सुनाई दिया और अब जब हैदराबाद में सामुहिक बलात्कार की घटना सामने आई तो इसे भी तेलंगाना के मुख्यमंत्री ने फास्ट ट्रैक कोर्ट में सुनवाई का आदेश दिया है। चलिए बताते हैं क्या है ये फास्ट ट्रैक कोर्ट (Fast Track Court) और इसकी प्रक्रिया कैसे शुरु हुई?

फास्ट ट्रैक कोर्ट क्या है?। What is Fast Track Court ?

Fast Track Court
Fast Track Court

27 नवंबर, 2019 को तेलंगाना में एक महिला डॉक्टर का रेप हुआ और अगले दिन उसकी जली हुई लाश मिली। फिर दो दिनों में चारों आरोपियों को गिरफ्तार किया गया और घटना के विरोध में लोग सड़कों पर उतर आए। घटना में शामिल लोगों को फांसी देने की मांग हो रही और तेलंगाना मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव ने 1 दिसंबर को इस मामले की सुनवाई को फास्ट ट्रैक कोर्ट में चलाने का आदेश दिया और पीड़िता और उसके परिवार को जल्द ही इंसाफ मिल जाए। मगर आपको पता होना चाहिए कि आखिर Fast Track Court क्या होता है, ये कैसे काम करता है और इसका कॉन्सेप्ट क्या है? भारत की अदालतों में लाखों केस पेंडिंग हैं और ऐसे में कई गंभीर मामलों की सुनवाई शुरु होने में सालों का समय लग जाता है। ऐसे में गंभीर मामलों खासकर बच्चों और महिलाओं से जुड़े यौन हिंसा या हत्या वाले मामले की सुनवाई को फास्ट ट्रैक कॉन्सेप्ट आया।

Fast Track Court का अहम मकसद ये है कि कम से कम समय में पीड़ित कक्ष को कानूनी मदद उपलब्ध कराया जाए और जल्द ही उन्हें इंसाफ मिल सके। साल 2001 में 11वां फाइनेंस कमीशन बना और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के पूर्व वीसी प्रोफेसर सैयद अली मोहम्मद खुसरो इसके चेयरमैन थे। कमीशन ने अदालतों में पेंडिंग मामलों को निपटाने के लिए 1734 फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने की सलाद पेश की। फाइनेंस मिनिस्ट्री ने इसके लिए 502.90 करोड़ रुपये जारी भी किए गए और ये पैसे सीधे राज्य सरकारों के पास भेजे। इससे वो अपने यहां के हाईकोर्ट से सलाह-मशवरा करके फास्ट ट्रैक कोर्ट बने और अटके हुए मामलों को जल्द से जल्द खत्म किया जा सके। ये फंड पांच साल के लिए जारी किया गया था और उम्मीद ये थी कि 5 साल में पेंडिंग मामलों का निपटारा किया जाएगा।

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फास्ट ट्रैक कोर्ट । Fast Track Court

Fast Track Court
Fast Track Court

31 मार्च, 2005 को फास्ट ट्रैक कोर्ट का आखिरी दिन था, उस समय 1562 फास्ट ट्रैक अदालतें काम कर रही थी और सरकार ने इनको जारी रखा था। फिर 509 करोड़ इनवेस्ट करके इसके कार्यकार को 5 साल के लिए यानी 2010 तक के लिए निर्धारित कर दिया गया। केंद्र के जजों की सैलरी के लिए सालाना 80 करोड़ देने का फैसला भी हुआ। किसी मामले के लिए Fast Track Court बनाने का फैसला उस राज्य की सरकार हाई कोर्ट से चर्चा के बाद करती है। फास्ट ट्रैक कोर्ट के जज की नियुक्ति कॉन्ट्रैक्ट के आधार पर होती है और ये नियुक्ति राज्य का हाई कोर्ट करता है। हाई कोर्ट फास्ट ट्रैक कोर्ट के लिए टाइमलाइन तय करता है कि सुनवाई कब पूरी होनी है। टाइमलाइन के आधार पर फास्ट ट्रैक कोर्ट तय करता है कि मामले को हर दिन सुना जाए और जल्द ही इसका निष्कर्ष भी निकाला जाए।

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