भारतीय कानून: किस तरह दी जाती है भारत में फांसी की सजा?

16 दिसंबर, 2012 को दिल्ली की रात एक प्राइवेट बस में एक 23 साल की लड़की निर्भया (बदला हुआ नाम) के साथ 6 लोगों ने बलात्कार किया। इतना ही नहीं उसे बुरी तरह मारा-पीटा और फिर बिना कपड़ों के सड़क के किनारे मरने के लिए छोड़ दिया। उस लड़की की हालत इतनी खराब हो गई कि दिल्ली के सफदरगंज अस्पताल से उसे सिंगापुर रिफर कर दिया गया और इस हादसे के 13 दिन के बाद उसका निधन हो गया। इसके बाद सभी आरोपियों को पकड़ लिया गया और आम लोगों में इतना आक्राश था कि सभी ने उनके लिए फांसी की सजा मांगी।

मगर Death penalty in India कोई आसान बात नहीं है, जब आरोप अच्छे से साबित हो जाता है और कानून के मुताबिक वो फांसी देने के लायक होता है तभी ऐसी प्रक्रिया को अंजाम दिया जाता है। ऐसा इसलिए क्योंकि संविधान के मुताबिक, गुनाहगार तो गलत करता ही है लेकिन अगर आक्रोश में आकर कानून भी उन्हें मौत की सजा दे तो ये सही नहीं होता है। मौत की सजा देने से पहले कोर्ट में बहुत सी दलीलों को सुना और समझा जाता है और अगर कोई दोषी पाया जाता है तो उन्हें निर्धारित समय फांसी दी जाती है। क्या आप जानते हैं कि फांसी की सजा यानी Death penalty कैसे दी जाती है?

इस तरह दी जाती है फांसी की सजा

Death penalty in India
Death penalty in India
दुनियाभर में करीब एक-चौथाई देशों में मौत की सजा दी जाती है और भारत उन देशों में एक है। भारत में मौत की सजा दो तरीकों से दी जाती है, पहली आम नागरिकों को फांसी पर लटकाकर मृत्युदंड दिया जाता है और दूसरा सेना फांसी के अलावा गोली मारकर मृत्युदंड दिया जाता है। सा ल1973 के Code of Criminal Procedure में फांसी के लिए स्टैंडर्ड शब्दावली है – ‘hanged by the neck until death’ यानी मौत होने तक गर्दन से लटकार रखा जाए। साल 1983 में सुप्रीम कोर्ट ने ये निर्देश दिए कि सिर्फ रेयरेस्ट ऑफ द रेयर केस में फांसी की सजा दी जाए इसका मतलब है कि केवल उन्हीं मामलों में फांसी दी जाएगी जो बहुत ही घिनौना हो। जो अपराध इतने क्रूर हों जिनके लिए कोर्ट को लगे कि फांसी से नीचे की कोई सजा कम होगी। जैसे साल 2012 में निर्भया गैंगरेप और मर्डर केस में हुआ था। हैदराबाद में वेटनरी डॉक्टर के रेप-मर्डर के बाद देशभर में गुस्सा फूट रहा है। सड़क से लेकर सोशल मीडिया तक लोग फांसी की मांग पर उतर आए हैं लेकिन भारत में फांसी की सजा की प्रोसेस कई लेयर्स और पेचीदा है।

क्या होते हैं फांसी से बचने के रास्ते?

मान लीजिए किसी अपराधी को सेशन कोर्ट यानी सत्र न्यायालय ने फांसी की सजा सुनाई है। सबसे पहले सेशन कोर्ट को फैसले में ये बताना होता है कि ये केस रेयरेस्ट ऑफ द रेयर क्यों है। सेशन कोर्ट को हाई कोर्ट की मंजूरी होनी चाहिए और हाई कोर्ट ये चेक करता है कि क्या सच में ये रेयरेस्ट ऑफ द रेयर केस है। जब दोनों कोर्ट इस बात के लिए राजी हो जाते हैं तब सेशन कोर्ट मौत की सजा सुना देता है। सेशन कोर्ट के फैसले के बाद दोषी के पास हाई कोर्ट में अपील करने का ऑप्शन भी होता है और हाई कोर्ट में जज एक बार सबूतों में नजर मारते हैं। अगर हाई कोर्ट भी इस सजा को बनाए रखता है तो पाया गया दोषी सुप्रीम कोर्ट तक भी जा सकता है। अगर सुप्रीम कोर्ट भी फांसी की सजा को बरकरार रखता है तो दोषी के पास आखिरी उम्मीद मर्सी पिटीशन बचता है। मर्सी पिटिशन का मतलब दया याचिका होती है और ये याचिका राष्ट्रपति या राज्यपाल के पास भेजी जाती है। इनके पास माफ करने का अधिकार होता है लेकिन राष्ट्रपति अकेले निर्णय नहीं ले सकते हैं उन्हें इसमें गृह मंत्रालय की सलाह की जरूरत पड़ती है तभी वे किसी नतीजे पर पहुंचते हैं।

Advertisement

ऐसे तैयार होता है फांसी का तख्ता

Death penalty in India
Death penalty in India

जब फांसी की सजा फाइनल होते ही डेथ वॉरेंट का इंतजार होता है। दया याचिका रिजेक्ट होने के बाद ये कभी भी आ सकता है। एक हफ्ता, महीना, कई महीने या फिर एक साल भी लग सकते हैं। उस डेथ वारंट में फांसी की तारीख और समय लिखा होता है, मृत्युदंड वाले कैदी के साथ आगे की कार्यवाही जेल मैनुअल के हिसाब से होती है। हर राज्य का अपना अलगजेल मैनुअल होता है और इनमें सारी डिटेल्स लिखी होती है जिनकी कुछ कॉमन बातें ऐसी हैं-

1. डेथ वॉरंट जारी होने के बाद कैदी को बता दिया जाता है कि फांसी होने वाली है।

2. किसी कैदी का डेथ वॉरंट जारी होने के बाद जेल सुप्रीटेंडेंट को प्रशासन को इसकी जानकारी देता है।

3. अगर कैदी किसी ऐसी जेल में बंद है जहां फांसी की सजा का अरेंजमेंट नहीं है, तो डेथ वॉरंट जारी होने के बाद उसे दूसरी जेल में शिफ्ट किया जाता है।

4. नए जेल में आते ही कैदी की पूरी चैकिंग होती है, उसे बाकी कैदियों से अलग सेल में रखा जाता है। ये सेल 24 घंटे एक गार्ड की निगरानी में रहता है और दिन में दो बार इस कैदी की तलाशी ली जाती है.

5. सुप्रीटेंडेंट, डिप्टी सुप्रीटेंडेंट या मेडिकल ऑफिसर कैदी के खान-पान की जांच करते हैं। बेहद सावधानी बरती जाती है जिससे कैदी किसी भी तरीके से आत्महत्या ना कर सके।

6. सामान्य परिस्थितियों में कैदी के परिवार को फांसी से 10-15 दिन पहले सूचना दे दी जाती है, जिससे वे आखिरी बार परिवार वाले मिल सकें।

7. फांसी देने के लिए मनीला रस्सी का इस्तेमाल किया जाता है और इस रस्सी की सारी डिटेल्स जेल मैनुअल में लिखी जाती हैं. फांसी से एक हफ्ते पहले सुप्रीटेंडेंट की मौजूदगी में इस रस्सी को चेक किया जाता है और चेक करने के बाद रस्सी को सुरक्षित लॉकअप में रख दिया जाता है। जिन जेलों में फांसी दी जाती है वहां कम से कम 2 रस्सियां पहले से रखी जाती हैं।

8. फांसी का टाइम महीनों के हिसाब से अलग-अलग होता है. सुबह 6, 7 या 8 बजे तय किया जाता है, लेकिन ये वक्त हमेशा सुबह का ही होता है। इसके पीछे कारण ये है कि सुबह बाकी कैदी सो रहे होते हैं और जिस कैदी को फांसी दी जानी है, उसे पूरे दिन मौत का इंतज़ार नहीं करना पड़े।

9. फांसी से कुछ मिनट पहले सुप्रीटेंडेंट जाकर कैदी को फांसी की जगह तक लेकर आता है और उनके साथ कुछ और गार्ड्स भी होते हैं। फांसी के वक्त जल्लाद के अलावा तीन अधिकारियों का होना जरूरी होता है जिसमें जेल सुप्रीटेंडेंट, मेडिकल ऑफिसर और मजिस्ट्रेट शामिल होते हैं। सुप्रीटेंडेंट फांसी से पहले मजिस्ट्रेट को बताते हैं कि मैंने कैदी की पहचान कर ली है और उसे डेथ वॉरंट पढ़कर सुना दिया है। डेथ वॉरंट पर कैदी का साइन होना ज़रूरी होता है और अब आगे का काम जल्लाद का होता है।

Death penalty in India
Death penalty in India

10. जल्लाद कैदी के मुंह पर कपड़ा डालकर, उसके गले में फंदा लगाने का काम करता है। इसके बाद लीवर खींच देता है। दुनियाभर में फांसी के चार तरीके होते हैं। भारत में लॉन्ग ड्रॉप तरीके से फांसी दी जाती है जिसमें कैदी के वज़न के हिसाब से रस्सी की लंबाई फिक्स की जाती है। ये इसलिए किया जाता है ताकि झटके से गर्दन और रीड की हड्डी टूट जाए। ऐसा माना है कि फांसी में लॉन्ग ड्रॉप वाला तरीका सबसे कम क्रूर होता है।

11. लीवर खींचने के लगभग आधे घंटे बाद ही लाश को फंदे से उतारा जाता है, लेकिन उसे तभी उतारा जाता है जब मेडिकल ऑफिसर उसकी मौत की पुष्टि कर देता है। मौत की पुष्टि के बाद मजिस्ट्रेट, मेडिकल ऑफिसर और सुप्रीटेंडेंट तीनों डेथ वॉरंट पर साइन करते हैं और इसके बाद उन्हें डेथ वॉरंट कोर्ट में वापस जमा करना होता है।

12. फांसी के बाद लाश परिवार को सौंप दी जाती है और जिन कैदियों के परिवार नहीं होते उनकी मौत से पहले उनसे पूछा जाता है कि अंतिम संस्कार कैसे करना है।

13. भारत में आखिरी फांसी साल 2015 में याकूब मेमन को दी गई थी जो साल 1993 मुंबई बम ब्लास्ट का दोषी था. उससे पहले अफज़ल गुरु को 2013 और अजमल कसाब को 2012 में फांसी हुई थी।

यह भी पढ़ें- कहीं कटते हैं प्राइवेट पार्ट तो कहीं है मौत की सजा, Rape के लिए दुनिया में हैं ये कानून

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *